देसी देसी

अपनों के लिए हुए हम परदेसी,
दिल तो मगर है देसी देसी !

भारत से निकले हम तो, किस्मत अपनी आजमाने को
पेशा या पढ़ाई, नापे मंज़िल की गहराई
छोड़ चले बचपन की गलियाँ, परदेस का आसमान छू लिया
पैसा कमाना है, घर बनाना है,
बचपन का वो सपना सच कर दिखाना है

लंडन हो या अमरीका, कड़ी मेहनत, यही है तरीका,
नहीं यहाँ कोई भेदभाव, लगन और ध्येय की हो चाव,
जो यह तपस्या करने हुआ राज़ी, समझो उसने मार ली बाजी,
नही चलती यहा कोई ड्रामेबाज़ी, नही किसिकी हांजी-हांजी.

अपनों के लिए हुए हम परदेसी, दिल तो मगर है देसी देसी

जब त्योहार हैं आते, हम social media खूब सजाते,
रंग-बिरंगी साड़ियां, कुर्ते, धोती पहनकर, परदेस में देश की रौनक बनाते,
हंसते, मुस्कुराते, पुराने रीति-रिवाज मनाते,
हम अपना ही दिल बहलाते.

आए जो कभी गम का साया, या जो गहरा अंधेरा छाया,
तुरंत होते एकजूट, भुलाके सारी फूट,
नही कोई शिकवा दिल के अंदर, अपना देश जो है दूर सात-समंदर.

और इसलिए,
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ना कोई रुसवा, ना कोई लड़ाई, कोई मिले पड़ोसी, तो परदेसी भी बन जाए देसी,
फिर “कटोरी भर नमक, थोडासा अजवाइन, मिलेगा क्या बहन?”
आना-जाना होता रोज़ाना, ना कोई गीला-शिकवा, नाही कोई ताना.

छुट्टियों में बच्चे इकट्ठे खेलें, हम संवारें यादों के मेले,
कोई चाची बने, कोई मौसी, क्योंकि परदेस में भी हम तो हैं देसी,
‘It takes a village to raise a child’
हम बनाते अपनी अलग सी देसी guide!

जाने-अनजाने हम कब बनते दोस्तों से परिवार,
फिर सजती महफिले हर शनिवार-इतवार.

दफ्तर जाते हम पहनकर सूट-बूट,
घर लौटते ही, we go back to our देसी loot!
जब मिलने जाए देसी दोस्तों के घर,
चल पड़ते हम सलवार-कुर्ता पहनकर.

झाड़ते हम अँग्रेज़ी ठेट

, पर बच्चे “माँ” पुकारे तो हमे लगती भेंट
हाय-हेल्लो का है यहा रिवाज, दिल में हैं फिर भी देसी लिहाज़
हम-उम्र से गले भी लगते, बुजुर्गों के सामने सिर आप ही झुकते
दहलीज के बाहर निकाले जूतों से होती है देसी घर की पहचान,
मानते हम यह अपनी संस्कृति की शान
चम्मच-काटे से काम चलालें, पेट भरना हो तो अन्न को हात लगालें.
स्टील की थालियां और कटोरी, देसी होते हैं बहुत चटोरी,
चाट पार्टी, पराठा, बिर्यानी की होती है बौछार,
भूक ना हो तो चाय ही पी लो यार!

Shweta Kulkarni Gode